Skip to content Skip to footer

Blog Standart

स्थानकवासी परम्परा और उसकी मौलिक मान्यताएँ

भगवान महावीर की विशुद्ध परम्परा निग्र्रन्थ, श्रमण, सुविहित आदि विविध रूपों का पार करती हुई समय के प्रभाव से स्थानकवासी के नाम से पुकारी जाने लगी। ‘स्थानक’ शब्द का अर्थ…

Read More

जैन धर्म में रत्न संघ एवं परम्परा का परिचय

जैन धर्म में रत्नवंश एवं परम्परा का परिचय कालचक्र (20 कोटाकोटि सागरोपम) जैन धर्म अनादि है, सनातन है, शास्वत है। शास्त्रीत मान्यानतानुसार कालचक्रम में उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी दो कालचक्र हैं, जिन्हें वृद्धिमान और हीयमान नाम से भी कह सकते हैं।…

Read More